ATUL DEPAK

'Faman afa wa a-salah fa-ajruhu ala-Allahi’ (But whoever forgives & makes reconciliation-his/her reward is due from Allah)

मज़दूर अधिकार जागरुगता कार्यशाला दिल्ली (संक्षेप/मुख़्तसर)

न्यूनतम वेतन फ़साद दिल्ली
साल 2017 में दिल्ली सरकार ने न्यूनतम मजदूरी (दिल्ली) तरमीमी अधिनियम 2017 के ज़रिए न्यूनतम मजदूरी में 37% का इज़ाफ़ा किया और साल 2018 में कामगारों/मज़दूरों को इस न्यूनतम मजदूरी (14000/- प्रति माह) का भुगतान सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर 10 दिवसीय कार्रवाई भी शुरू की। न्यूनतम मजदूरी क़ानून का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए टीमें बनाई गई जिन्होंने विभिन्न स्थानों में छापेमारी शुरू की। दिल्ली सरकार के इस क़दम का मुख़्तलिफ़ मालिकों और बड़े ठेकेदारों ने कड़ा विरोध किया और दिल्ली उच्च न्यायालय में इसके ख़िलाफ़ अर्ज़ी दायर की। इस अर्ज़ी को अदालत ने क़बूल करते हुए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने वाली कार्रवाई पर रोक लगा थी। दिल्ली हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी जिसके बाद अदालत-ए-उज़मा ने हाई कोर्ट द्वारा दिया हुआ फ़ैसला बदल दिया।

NLU में काम कर रहे मजदूरों/मुलाजिमों के लिए कुछ ख़ास टिप्स

टिप 1: – क्या आप मुफ़्त कानूनी मदद के हकदार हैं? इसकी जाँच करें।

अगर आप नीचे दिए गए NLSA 1987 के दफ़ा 12 में मौजूद किसी भी दायरे में आते हैं तो आप हिंद में निशुल्क कानूनी मदद हासिल करने के हकदार हैं-

  • अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य हैं; या
  • भिखारी हैं या मानव तस्करी के शिकार हैं; या
  • एक औरत या एक बच्चे हैं; या
  • विकलांग व्यक्ति है; या
  • नाहक परिस्थितियों, जातीय हिंसा, जातीय अत्याचार, बाढ़, सूखा, भूकंप या औद्योगिक आपदा का शिकार हैं; या
  • एक औद्योगिक मज़दूर; या
  • अनैतिक तस्करी (रोक) अधिनियम, 1956 के तहत एक सुरक्षात्मक हिरासत में, या बाल सुधार गृह में या मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के तहत एक मनोरोग अस्पताल या मनोरोग नर्सिंग होम में हैं; या
  • वार्षिक आय नौ हजार या राज्य सरकार द्वारा निर्धारित आय से कम है , इत्त्यादि।

टिप 2: – क्या आपकी तनख़्वाह आपके बैंक खाते के ज़रिए आ रही है?

  • दिल्ली सरकार की एक योजना के तहत श्रमिकों/कामगारों का वेतन सीधे उनके बैंक खाते में देना है। यह न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने के लिए हैं।
  • ख़बरदार : – यह कुछ मामलों में देखा गया है कि मालिक श्रमिकों बैंक खाते में न्यूनतम मजदूरी तो भेज देते है लेकिन अगले ही दिन उसमें से कुछ रक़म वापिस माँग लेते है। ये एक धोखाधड़ी है जिसकी तुरंत शिकायत करें।
  • ऐसे मामलों में, कामगारो को सामूहिक रूप से श्रम आयोग में शिकायत करना चाहिए।
  • ओवर टाइम काम करने के लिए आप अधिक मजदूरी के हकदार हैं। कानूनी सहायता क्लिनिक से तुरंत राब्ता/संपर्क करें अगर आपको ओवर टाइम काम करने के लिए ज़्यादा भुगतान नहीं किया जा रहा है।

टिप 3: – क्या आपके पास अपने रोज़गार के ज़रूरी दस्तावेज़ मौजूद हैं?

  • अपने रोज़गार के सारे काग़ज़ और दस्तावेज़ संभाल कर रखे।
  • आप अपने रोजगार और काम की परिस्थितियों से जुड़े सारे दस्तावेज़ो का एक रिकॉर्ड बना कर ज़रूर रखे।

टिप 4: – क्या आप यौन उत्पीड़न या किसी क़िस्म की बदसलूकी को संजीदगी से लेते हैं?

  • किसी भी क़िस्म का यौन उत्पीड़न एक क़ानूनी जुर्म है। इस मुद्दे पर ज़्यादा जानकारी के लिए कानूनी सहायता क्लिनिक से राब्ता करे।
  • अगर ऐसा कोई भी वाक़िया हो तो नज़रंदाज़ बिलकुल ना करे और अगर उस वक़्त आप शिकायत नहीं करना चाहते है तो कम से कम अपने किसी कामगार WhatsApp group पर ही इस बात का ज़िक्र करें ताकि बाद में ज़रूरत पड़ने पर उसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। ये सारी चीज़ें आपको आपके हक़ में फ़ैसला दिलवाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

टिप 5: – क्या आपको नौकरी से निकाले जाने का डर है?

  • ख़याल रहे की रोजगार से निकालने से पहले जांच-पड़ताल क़ानूनन ज़रूरी है।
  • ऐसे में इंसाफ़ के अमर सिद्धांतों का पालन किया जाना भी ज़रूरी है।
  • आपको अपनी बात रखने का मौक़ा दिए बग़ैर ठेकेदार या मालिक आपको नौकरी से नहीं निकाल सकता।
  • ख़याल रहे की नौकरी से निकालने के 3 महीने पहले की नोटिस देना भी ज़रूरी है।
  • अगर आपको बेवजह नौकरी से निकला जाता है तो आप मुआवजा के भी हक़दार है।
  • अगर किसी संस्था में 100 से ज़्यादा मज़दूर हैं, तो सरकार की पूर्व इजाज़त के बग़ैर आपको नौकरी से नहीं निकला जा सकता।

टिप 6: – ग़ैर मुंसिफ़ाना मुलाजिम रिवाजों से ख़बरदार रहें।

  • मालिक या ठेकेदार आपसे मनमाने ढंग से बर्ताव नहीं कर सकता है और ख़ासकर कोई ग़ैर मुंसिफ़ाना/अनुचित भेदभाव नहीं कर सकता है।
  • इस मसले पर अधिक जानकारी के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम को पढ़े या फिर कानूनी सहायता क्लिनिक से राब्ता करे।
  • मालिक और ठेकेदार अपना रौब दिखाकर श्रमिकों का शोषण नहीं कर सकते हैं।
  • मालिक दो मज़दूरों के दरमियाँ अनुचित तरीक़े से भेदभाव नहीं कर सकता है।

टिप 7: – क्या आप बोनस, ईपीएफ और ग्रटूयटी जैसे फ़ायदों से महरूम हैं?

  • कुछ स्थितियों में ये सारी चीज़ें आपको हक़/अधिकार के तौर पर मिलनी चाहिए। अधिक जानकारी के लिए कानूनी सहायता क्लिनिक से राब्ता करे।
  • बोनस – कंपनी के फ़ायदे का एक हिस्सा श्रमिकों को भुगतान करना पड़ता है जिसको बोनस कहते है। इन दिनों सांविधिक बोनस (8.33%) को लाभ या हानि की परवाह किए बग़ैर भुगतान करना पड़ता है।
  • बोनस का भुगतान ठेकेदार द्वारा किया जाता है।
  • रिवायती बोनस – यह बोनस अक्सर त्योहारों में तकसीम किया जाता है।
  • कुछ मामलों में अगर ठेकेदार मज़दूरी नहीं दे रहा है, तो मुख्य मालिक से भी आप मज़दूरी की डिमांड कर सकते है।
  • उदाहरण – NLU को सुरक्षा गार्ड मुहैया कराने वाली ठेकेदार कंपनी “अनुबंध श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1970” के तहत पंजीकृत नहीं है। NLU को ऐसे ठेकेदार से कॉंट्रैक्ट नहीं करना चाहिए था जो कि रेजिस्टर्ड ही नहीं है। हालांकि कुछ मामलों में NLU को भी ज़िम्मेवार ठहराया जा सकता है।
  • ग्रेच्युटी का हक़ पाने के लिए एक संस्था में कम से कम 5 साल लगातार काम करना ज़रूरी है ।
  • भविष्य निधि अब हस्तांतरणीय है।

टिप 8: – क्या मज़दूर और ठेकेदार के बीच बेमानी वाले करारदाद/समझौते हैं?

  • नकली करारदादो से ख़बरदार रहे और फ़र्ज़ी ठेकेदारो से भी सावधान रहें।
  • ठेकेदार या मुख्य मालिक मज़दूरों के साथ अनुचित या नाइंसाफ़ी वाला समझौता नहीं कर सकते है और ऐसा भी कोई समझौता नहीं कर सकते जो क़ानून के ख़िलाफ़ हो या फिर हिंद के दस्तूर के ख़िलाफ़ हो।

टिप 9: – एक औद्योगिक विवाद का केस कैसे करें?

  • औद्योगिक विवाद मज़दूरों के ज़रिए श्रम आयोग में उठाया जा सकता है।
  • आम तौर पर मज़दूर ट्रेड यूनियन से शिकायत करते है ट्रेड यूनियन मालिकों से मज़दूरों के बेहतरी के लिए मुजाकरात/सौदेबाज़ी करता है।

टिप 10: – आप ठेकेदार के मुलाजिम हैं या जिसके यहाँ काम कर रहे हैं उसके?

  • कानून के मुताबिक़, मुख्यतः आप ठेकेदार के मुलाजिम/कर्मचारी हैं ना की NLU के।

कुछ मुशाहिदात/टिप्पणिया : –

  • मुलाजिम/कर्मचारी (सुरक्षा गार्ड, हाउस कीपिंग़ और बावर्चीखाना स्टाफ, इत्त्यादि) बहुत मुतमइन/संतुष्ट नहीं दिखे।
  • वे बोनस, ग्रटूयटी, मजदूरी की कटौती, जैसे कुछ मुद्दों पर एकजुट नहीं थे।
  • उनके कई सारे सवाल करना चाहते थे पर ज़्यादा वक़्त ना होने की वजह से उन्हें मायूसी का सामना करना पड़ा।
  • कामगारों/मुलाजिमों और बोलने वाले के दरमियाँ ज़ुबानी राब्ते की कमी नज़र आयी।
  • मुलाजिम/कर्मचारी अपने मुद्दों को लेकर बेबाक़ थे पर थोड़े फ़िक्रमंद भी थे।

नोट: – ऊपर दी गयी जानकारी 16 अप्रैल, 2019 को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली एक मज़दूर अधिकार कार्यशाला पर आधारित है।

ध्यान दें – इस सफ़े पर दी गयी जानकारी जागरूकता के लिहाज़ से दी गयी सिर्फ़ आम जानकारी ही है और इसका मक़सद या इरादा कोई क़ानूनी सलाह-मशवरा देना नहीं है। किसी भी तथ्य को विस्तृत और हक़ीकी तौर पर जानने के लिए आप किसी कानूनी सहायता क्लिनिक या फिर किसी वक़ील से राब्ता करें। इस वेबसाइट पर दी गयी जानकारी में कुछ ग़ैर इरादतन कमियाँ भी हो सकती है और उन जानकारियों के इस्तेमाल से हुए किसी भी नुक़सान की ज़िम्मेदारी वेबसाइट की ना होगी।

कामना– ईश्वर आपको सच और ईमान की हिदायत दे और आपकी ज़िंदगी में ख़ुशहाली लाए। 🌹